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श्रद्धांजलि | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी की जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की

Updated on Saturday, December 03, 2022 12:24 PM IST

प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।

एक ट्वीट में, प्रधानमंत्री ने कहा;

“डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी को उनकी जयंती पर नमन करता हूं। वह एक महान नेता और साहस एवं विद्वतापूर्ण उत्साह के प्रतीक थे। उनका व्यक्तित्व भारत की संस्कृति में दृढ़ता से निहित था और वह भारत के विकास के प्रति एक भविष्यवादी दृष्टिकोण भी रखते थे।”

डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति एवं महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई। सीवान जिले के जीरादेई में जनमे राजेंद्र बाबू बचपन से ही काफी मेधावी थे. उस वक्त गांव में पढ़ाई के उतने साधन भी नहीं थे, फिर भी 1902 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेशिका परीक्षा में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था. उस समय इस विवि के क्षेत्राधिकार में बिहार, बंगाल, ओड़िशा, असम व बर्मा (म्यांमार) तक शामिल थे. बीए की परीक्षा में भी दो विषयों में उन्हें प्रथम श्रेणी में प्रतिष्ठा प्राप्त हुआ था. बाद में उच्च अंकों से एलएलएम की डिग्री भी हासिल की. राजेंद्र बाबू के पढ़ने की शैली भी विशिष्ट थी. उन्होंने कभी ट्यूशन नहीं पढ़ा. उनका कहना था कि ट्यूशन नहीं पढ़ने के कारण वह कक्षा में बहुत ध्यान से पढ़ते थे. राजेंद्र बाबू कॉलेज के समय से ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गये थे. बंगाल विभाजन व स्वदेशी आंदोलन ने उनके युवा मन को बहुत प्रभावित किया. कॉलेज में तृतीय वर्ष में ही उन्होंने जीवन का पहला चुनाव जीता, जब वह कॉलेज यूनियन के सचिव बने. 1906 में उन्होंने बिहार छात्र सम्मेलन का आयोजन किया. इसी संस्था ने बाद में दशकों तक बिहार को राजनीतिक नेतृत्व दिया.

डॉ राजेंद्र प्रसाद ने गांधी जी की प्रेरणा से 1921 में सदाकत आश्रम में एक राष्ट्रीय विवि के रूप में बिहार विद्यापीठ की स्थापना की और इसे अपनी कर्मभूमि बनायी. जयप्रकाश नारायण ने भी इसी जगह पढ़ाई की. राजेंद्र बाबू स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान खादी आंदोलन के प्रणेता बने. उन्होंने खादी के अर्थशास्त्र पर एक किताब भी लिखी. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान चार जनवरी, 1932 को बिहार विद्यापीठ में लगाये झंडे को तत्कालीन आरक्षी अधीक्षक ने हटा कर ब्रितानी हुकूमत का झंडा लगा दिया. राजेंद्र बाबू व अन्य को गिरफ्तार कर बिहार विद्यापीठ को अपने कब्जे में कर लिया. कई महीनों तक सत्याग्रहियों ने बिहार विद्यापीठ को मुक्त करा कर झंडा चौक को मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया. हजारों लोगों ने गिरफ्तारियां दीं. 1942 में भी बिहार विद्यापीठ को पुनः एक बार ब्रितानी हुकूमत ने अपने कब्जे में ले लिया और राजेंद्र बाबू को गिरफ्तार कर लिया. इससे बिहार विद्यापीठ में शैक्षणिक गतिविधियां बंद ही हो गयीं. इस प्रकार राजेंद्र बाबू का देशप्रेम, स्वाबलंबन, स्वरोजगार, स्वराज व स्व-संस्कृति पर आधारित एक विश्वविद्यालय बनाने का सपना स्वाधीनता संग्राम की भेंट चढ़ गया.

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