काल भैरव अष्टमी मंगलवार को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला के ज्वालामुखी में धर्मिक श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाई गई। बड़ी तादाद में श्रद्धालु यहां बाबा भैरव के मंदिर में सुबह से ही दशनों को आने शुरू हो गये थे। जिससे महौल भक्तिमय बना हुआ है।
स्थानीय एसडीएम संजीव शर्मा, डीएसपी विकास धीमान व तहसीलदार मनोहर लाल शर्मा ने भी यहां भैरव मंदिर में पूजा अर्चना की।
प्रसिद्ध शक्तिपीठ ज्वालामुखी से सटी कालीधार के आंचल में स्थित हजारों साल पुराने इस मंदिर का अपना एक महत्व है। यहां आज भी श्रद्धालु , भैरव को प्रसन्न करने व अपनी मन्नत पूरी होने पर मदिरा से भैरव का अभिषेक करते हैं। इस जंगल में आज के दिन जब लोग यहां जुटते हैं तो यहां जगल में मंगल वाली कहावत सिद्ध होती है। घने जंगल में भक्तों की मौजूदगी से रौनक देखते ही बनती है।
बाबा भैरव के दरबार में आज दिन भर उल्लास का माहौल रहा। ऐसा माना जाता है कि सती के अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे तो शक्तिपीठ बने वहीं भगवान शंकर वहां वहां भैरव रूप में अवतरित हुये। ज्वालामुखी में उन्मत्त भैरव रूप में स्थापित हैं।
ऐसा माना जाता है कि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को भगवान भोले नाथ भैरव रूप में प्रकट हुए थे। हजारों साल पुरानी इस प्रस्तर प्रतिमा पर श्रद्धालु नतमस्तक हो अपनी मनौतियां मांगते हैं। यहां प्रसाद के रूप में बाकायदा मदिरा भी चढ़ाई जाती है। पहले पश्ु बलि का भी विधान था। लेकिन हिमाचल हाईकोर्ट के आदेशों के चलते इसे रोका गया है।
आयोजन समिति के सदस्य राहुल शर्मा ने बताया कि प्राचीन चली आ रही परंपरा के तहत ज्वालामुखी के लोगों की ओर से यहां भैरव जयंती के अवसर पर श्रद्धालुओं के लिये विशेष भंडारे की व्यवस्था पूरा दिन के लिये की गई । उन्होंने बताया कि श्रद्धालु यहां भैरव को खुश करने के लिये उनके भक्त अभिषेक कर रहे हैं। जिससे यहां भक्तिमय माहौल बना है। भैरव मंदिर के आसपास के सुनसान जंगल में भी आज अनोखा ही नजारा बना रहा।
आचार्य प्रबल शास्त्री ने बताया कि इस साल भी यहां पूरा दिन श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य देव का पूजन किया,उन्होंने कहा कि भैरव को दंडाधिपति भी कहा जाता है। उनका वाहन कुत्ता है। उन्होंने बताया कि भगवान भैरव को खुश करने के लिए विशेषकर चमेली के तेल व खुशबूदार फूलों से अभिषेक किया जाता है। उनकी पूजा रात्रि काल में ही होती है। उन्होंने बताया कि भैरव अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाते हैं। शिव के इस भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों के सभी प्रकार के पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं. इनकी भक्ति मनोवांछित फल देने वाली कही गयी है।
ज्वालामुखी के एसडीएम संजीव शर्मा ने बताया कि मंदिर प्रशासन ने यहां विशेष इंतजाम किए थे।
आज श्री कालभैरवाष्टमी है। काशी के कोतवाल ज्वालामुखी में उन्मत्त भैरव के रूप में विराजमान हैं। आज मुझे भी उनके दर्शन करने का सौभागय मिला। भैरव को शिवजी का अंश अवतार माना गया है। रूद्राष्टाध्याय तथा भैरव तंत्र से इस तथ्य की पुष्टि होती है। भैरव जी का रंग श्याम है। उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें वे त्रिशूल, खडग़, खप्पर तथा नरमुंड धारण किए हुए हैं। उनका वाहन श्वान यानी कुत्ता है। भैरव श्मशानवासी हैं। ये भूत-प्रेत, योगिनियों के स्वामी हैं। भक्तों पर कृपावान और दुष्टों का संहार करने में सदैव तत्पर रहते हैं।भगवान भैरव अपने भक्तों के कष्टों को दूर कर बल, बुद्धि, तेज, यश, धन तथा मुक्ति प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति भैरव जयंती को अथवा किसी भी मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भैरव का व्रत रखता है, पूजन या उनकी उपासना करता है वह समस्त कष्टों से मुक्त हो जाता है। श्री भैरव अपने उपासक की दसों दिशाओं से रक्षा करते हैं। बाबा भैरव को क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी जाना जाता है।
‘अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का, काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।’