बद्रीनाथ मंदिर जिसे बद्रीनारायण मंदिर भी कहा जाता है, उत्तराखंड के बद्रीनाथ शहर में स्थित है, यह राज्य के चार धामों (चार महत्वपूर्ण तीर्थों) में से एक है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ नामक चार तीर्थ-स्थल हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से चार धाम के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ लगभग 3,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां से जुड़ी धार्मिक मान्यता है कि, मंदिर में जाने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद मिलती है।
उत्तराखंड के हिमालयी गढ़वाल क्षेत्र के बद्रीनाथ शहर में स्थित, मंदिर समुद्र तल से 10200 फीट की ऊंचाई पर है। मंदिर के ठीक सामने भव्य नीलकंठ चोटी है। मंदिर जोशीमठ से लगभग 45 किमी दूर है, जो कि एक बेस कैम्प भी है। इतिहास की किताबें कहती हैं कि मंदिर वैदिक युग का है जो लगभग 1500 ईसा पूर्व में शुरू हुआ था। मंदिर का उल्लेख कई वैदिक ग्रंथों, पुराणों में मिलता है। यह भी माना जाता है कि मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया था, जो एक भारतीय संत थे। वह 814 से 820 तक बद्रीनाथ मंदिर में रहे और उन्होंने केरल के एक नंबूदिरी ब्राह्मण को यहां का मुख्य पुजारी बनने के लिए कहा। आज भी ये परंपरा जारी है।
बद्रीनाथ का मौसम लगभग पूरे साल ठंडा रहता है। इस जगह पर जाने का पीक सीजन मई से जून और सितंबर से अक्टूबर के बीच होता है। मानसून के मौसम की शुरुआत के साथ, बद्रीनाथ में भारी वर्षा और तापमान में गिरावट देखी जाती है। भारी बर्फबारी के कारण यहां सर्दियों में ठंड बेहद बढ़ जाती है। अधिकतर सर्दियों में तो तापमान माइनस डिग्री तक पहुंच जाता है। इसलिए गर्मी का मौसम इस जगह की यात्रा के लिए परफेक्ट समय है। जिस मौसम में आप यहां यात्रा करने जा रहे हैं, बस इस बात का ध्यान रखें कि आप उस हिसाब के कपड़े जरूर लेकर जाएं।
बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के विषय में मान्यता है कि, भगवान बद्रीविशाल जी के महाभिषेक के लिए तिल का तेल का प्रयोग किया जाता है। इस तेल को टिहरी राजदरबार में सुहागिन महिलाओं द्वारा विशेष पोशाक पहन कर तैरार करने के उपरांत डिम्मर गांव के डिमरी आचार्यों द्वारा लाए गए कलश में भर दिया जाता है जिसे गाड़ू घड़ा कहते हैं। इसी कलश को श्री बद्रीनाथ पहुंचाने की प्रक्रिया गाडू घड़ा कलश यात्रा कहलाती है।
जोशीमठ पहुंचने के उपरांत आदि गुरु शंकराचार्य की डोली भी इसी यात्रा के साथ योग ध्यान बद्री पाण्डुकेश्वर पहुंचती है। पाण्डुकेश्वर पहुंचने के उपरांत योग ध्यान बद्री में शीतकालीन प्रवास हेतु विराजमान भगवान उद्धवजी एवं भगवान कुबेरजी की डोली, शंकराचार्यजी की डोली। गाडू घड़ा कलश यात्रा के साथ श्री बद्रीनाथजी के धाम के पहुंचती है।