गूग्गा पूजन और गूग्गा की मान्यता की परंपरा हमारे पहाड़ और मैदानी क्षेत्रों में किसी एक समय विशेष में ही नहीं रही, बल्कि इसके पीछे एक लंबी लोक-सांस्कृतिक परंपरा दिखाई देती है। इन क्षेत्रों में सिद्धनाथ परंपरा का भी गहरा प्रभाव रहा है। गुरु गोरखनाथ के समय से ही लोगों में सिद्धों और योगियों के प्रति गहरी आस्था रही और उनके धर्म, साधना तथा लोक-विश्वासों से जुड़े अनेक रूप जनजीवन में प्रचलित हुए। गूग्गा से संबंधित विश्वास भी इसी व्यापक लोकपरंपरा का एक हिस्सा माना जा सकता है।
लोकमान्यता में गूग्गा का संबंध विशेष रूप से सर्प और सर्पदंश से जोड़ा गया है। पुराने समय में जब किसी व्यक्ति को सर्प काट लेता था तो उसे जागृत रखने का प्रयास किया जाता था। यह लोकविश्वास था कि व्यक्ति को निद्रा में नहीं जाने देना चाहिए, क्योंकि सो जाने पर विष का प्रभाव बढ़ सकता है। ऐसे समय में ढोल और दवातरा जैसे वाद्यों के साथ गूग्गा की गाथा गाई जाती थी। गायन, वादन और सामूहिक जागरण के माध्यम से रोगी को लगातार जागृत रखा जाता था। इस प्रकार गूग्गा गायन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि लोकजीवन में उसका एक उपचारात्मक पक्ष भी विकसित हो गया था।
गूग्गा गाथा क्या है?
गूग्गा गायन को हम गूग्गा गाथा भी कहते हैं। ‘गाथा’ का अर्थ ही किसी व्यक्ति के जीवन, कर्म और शौर्य का क्रमबद्ध स्तुति-गायन है। गूग्गा की गाथा में उनके जन्म, शौर्य, वीरता और पराक्रम के साथ-साथ लोककल्याण से जुड़े कार्यों का भी वर्णन मिलता है। इसलिए गूग्गा गाथा को केवल धार्मिक स्तुति मानना पर्याप्त नहीं होगा; वह लोकस्मृति में सुरक्षित एक वीरगाथात्मक आख्यान भी है।
ऐसा माना जाता है कि गूग्गा की यह परंपरा राजस्थान की ओर से चलकर हिमाचल और विशेषकर कांगड़ा क्षेत्र तक पहुँची। आज भी कांगड़ा के अनेक हिस्सों में गूग्गा के थान और गूग्गा मड़ियाँ इस परंपरा की जीवित स्मृतियों के रूप में दिखाई देती हैं।
नूरपुर में शिब्बो का थान, पालमपुर के निकट सलोह में गूग्गा सलोह और रानीताल की ओर नाग से संबंधित लोकमान्यताएँ इस परंपरा के विभिन्न रूपों की ओर संकेत करती हैं। ज्वालामुखी क्षेत्र से लेकर व्यास के पार डाडा सीबा और आसपास के इलाकों तक सड़क किनारे अनेक गूग्गा मड़ियाँ दिखाई देती हैं। ये छोटी-छोटी मड़ियाँ केवल पूजा के स्थान नहीं हैं; वे उस लोकविश्वास की स्मृतियाँ हैं, जिसने पीढ़ियों तक ग्रामीण समाज को अपने साथ जोड़े रखा।
गूग्गा मड़ियाँ और पंज पीरी
साधारण लोकभाषा में गूग्गा मड़ियों को कई जगह ‘पंज पीरी’ भी कहा जाता है। इनमें गूग्गा के साथ उनके सहयोगी या सहचर माने जाने वाले अन्य पात्रों की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं। इन प्रतिमाओं का एक विशिष्ट रूप है—वे प्रायः खुले स्थान में स्थापित होती हैं और गूग्गा को घोड़े पर आरूढ़ दिखाया जाता है।
घोड़ा यहाँ केवल सवारी का साधन नहीं है। लोकप्रतीक के रूप में वह वीरता, गति और शौर्य का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए घोड़े पर बैठे गूग्गा की प्रतिमा लोकमानस में उन्हें एक वीर और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
दवातरा और गूग्गा गायन की धुन
गूग्गा गाथा के गायन की अपनी एक विशेष धुन है। इसे जोगी अपने दवातरा नामक तारवाद्य के साथ गाता है। दवातरा एकतारे जैसा वाद्य है, जिसे अंगूठे और उंगली की टंकार से बजाया जाता है। तार के सिरे को उँगलियों से दबाकर उसके स्वर और धुन को नियंत्रित किया जाता है।
इस गायन के साथ जिस ताल का प्रयोग होता है, उसे कई स्थानों पर ‘जंग ताल’ या ‘युद्ध ताल’ कहा जाता है। कहीं-कहीं इसे ‘मारू ताल’ भी कहा जाता है। वाद्य की टंकार, ताल की गति और गाथा के स्वर मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें श्रोता सामान्य अवस्था से अलग एक गहरी भावावस्था में पहुँच जाता है।
पुराने समय में इस भावावस्था को लोकसमाज अपनी भाषा में ‘देवता का आना’, ‘अपराशक्ति का प्रभाव’ या किसी अदृश्य शक्ति के वशीभूत होना कहता था।
‘खेल पात्र’ की परंपरा
पहाड़ के पुराने समाज को समझते हुए हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि उस समय शिक्षा और वैज्ञानिक चेतना का व्यापक प्रसार नहीं हुआ था। इसलिए लोकजीवन में विश्वासों के साथ-साथ अंधविश्वास भी बड़ी संख्या में मौजूद थे। विश्वास का जब विवेक से संबंध टूट जाता है तो वही विश्वास धीरे-धीरे अंधविश्वास का रूप ले लेता है।
गाँवों में ऐसे अनेक लोग माने जाते थे जो किसी अदृश्य या अपराशक्ति के प्रभाव में हैं। विशेष रूप से स्त्रियों के संबंध में ऐसे विश्वास अधिक प्रचलित थे। ऐसे अवसरों पर गूग्गा के जोगी या गायक को बुलाया जाता था और घर में एक विशेष अनुष्ठान किया जाता था, जिसे कई स्थानों पर ‘खेल पात्र’ कहा जाता था।
जिस व्यक्ति के ऊपर अपराशक्ति का प्रभाव माना जाता, उसे इस अनुष्ठान में बैठाया जाता। दवातरा बजता, जंग या मारू ताल की गति बढ़ती और गूग्गा की गाथा अपने विशिष्ट स्वर में गाई जाती। धीरे-धीरे वह व्यक्ति उस संगीत और वातावरण से अभिभूत होकर झूमने लगता।
आधुनिक दृष्टि से देखें तो इस पूरी प्रक्रिया में संगीत, लय, सामूहिक वातावरण और मनोवैज्ञानिक प्रभाव की अपनी भूमिका रही होगी। लेकिन उस समय का लोकसमाज इसे अपने विश्वासों की भाषा में समझता था।
इस अनुष्ठान का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था—प्रश्नोत्तर।
गूग्गा गायक के साथ एक व्यक्ति उसका ‘चेला’ होता था। चेला गूग्गा की गाथा जानता था और साथ ही उस व्यक्ति से प्रश्न करने की पूरी पद्धति से भी परिचित होता था। वह प्रभावित व्यक्ति से अनेक प्रश्न करता और उसके उत्तरों के माध्यम से यह जानने का प्रयास करता कि उसके भीतर किस प्रकार की शक्ति या समस्या का प्रभाव माना जा रहा है।
इस प्रकार गूग्गा गायन की परंपरा केवल गायन और वादन तक सीमित नहीं थी। उसमें कथा, संगीत, अनुष्ठान, प्रश्नोत्तर और लोकमनोविज्ञान—इन सबका एक अद्भुत सम्मिलन दिखाई देता है।
गूग्गा की फेरियाँ
गूग्गा गायन का दूसरा प्रमुख रूप गूग्गा की फेरियों में दिखाई देता है। विशेष रूप से रक्षाबंधन के आसपास गूग्गा के थानों और गूग्गा मड़ियों में गूग्गा का झंडा चढ़ाया जाता है। इसके बाद गाँवों में गूग्गा की फेरियाँ आरंभ होती हैं।
लोकविश्वास है कि जिस गाँव में गूग्गा की फेरी पहुँचती है, वहाँ की नकारात्मक या अपराशक्तियों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। इसलिए फेरी केवल धार्मिक यात्रा नहीं होती थी; वह पूरे गाँव के लिए सामूहिक विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक बन जाती थी।
ये फेरियाँ कई दिनों तक गाँव-गाँव चलती थीं और नवमी के दिन उनका विशेष समापन माना जाता था। गूग्गा मड़ियों और गूग्गा थानों में पूजा, हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते। कहीं-कहीं भंडारे भी आयोजित होते।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गूग्गा की परंपरा केवल किसी एक देवता की पूजा तक सीमित नहीं रही। उसने लोकजीवन के भय, विश्वास, बीमारी, उपचार, संगीत, कथा, वीरता और सामुदायिक सुरक्षा—इन सबको अपने भीतर समेट लिया।
इसीलिए गूग्गा गाथा को केवल एक धार्मिक गीत के रूप में देखना उसके व्यापक लोक-सांस्कृतिक स्वरूप को छोटा कर देना होगा। वह हमारे ग्रामीण समाज की स्मृति में सुरक्षित एक ऐसी जीवित परंपरा है जिसमें वीरगाथा भी है, लोकविश्वास भी, संगीत भी, अनुष्ठान भी और लोकमनोविज्ञान भी।
आज जब वैज्ञानिक चेतना ने सर्पदंश और अनेक रोगों के उपचार के स्पष्ट रास्ते हमारे सामने खोल दिए हैं, तब इन लोकपरंपराओं को उसी पुराने उपचार-विधान के रूप में स्वीकार करने के बजाय उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अर्थ को समझना अधिक आवश्यक है। गूग्गा गायन इसी दृष्टि से हमारे लोक-सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है—एक ऐसी परंपरा, जिसमें पहाड़ का भय भी बोलता है, उसका विश्वास भी, उसकी वीरता भी और उसकी सामूहिक स्मृति भी।
संदर्भ -डा.व्यथित से हुए वार्तालाप पर आधारित