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धर्मशाला | ज्वालामुखी मंदिर में सुधारों के बीच बढ़ा विवाद, अधिकारी अजय मंडयाल के फैसलों से एक वर्ग नाराज़

Updated on Tuesday, April 07, 2026 12:56 PM IST

VIP कल्चर खत्म करने और व्यवस्था सुधारने की पहल पर उठे सवाल—दर्शन व्यवस्था और चढ़ावे की पारदर्शिता पर भी बहस तेज

हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध शक्तिपीठ ज्वालामुखी मंदिर में इन दिनों प्रशासनिक बदलावों और सुधारात्मक कदमों के बीच विवाद की स्थिति बनती नजर आ रही है। हाल ही में मंदिर अधिकारी के रूप में तैनात हुए अजय मंडयाल जहां एक ओर व्यवस्था में सुधार लाने के प्रयासों को लेकर चर्चा में हैं, वहीं दूसरी ओर उनके कुछ फैसलों को लेकर एक वर्ग में असंतोष भी सामने आ रहा है।

जानकारी के अनुसार अजय मंडयाल ने बीते महीने ही ज्वालामुखी मंदिर में कार्यभार संभाला है। इससे पहले वह चिंतपूर्णी मंदिर में अपनी सेवाएं दे चुके हैं, जहां उनके कार्यकाल को प्रभावी और अनुशासित प्रबंधन के लिए जाना जाता है। मंदिर प्रशासन के क्षेत्र में उनके अनुभव को देखते हुए ज्वालामुखी में भी उनसे कई सकारात्मक बदलावों की उम्मीद की जा रही थी।

तैनाती के तुरंत बाद ही उन्होंने मंदिर व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए कई कदम उठाए। इनमें सबसे अहम पहल वीआईपी कल्चर को समाप्त करने और तथाकथित “चोर दरवाजे” से होने वाली अनधिकृत एंट्री पर रोक लगाने की रही। इन कदमों का उद्देश्य आम श्रद्धालुओं को सुगम और समान अवसर प्रदान करना बताया जा रहा है। हालांकि, इन बदलावों से जुड़े हितों पर असर पड़ने के चलते कुछ लोग इन निर्णयों से असहज नजर आ रहे हैं।

मंदिर सरकारी नियंत्रण में होने के बावजूद व्यवस्थाओं को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि सीसीटीवी मॉनिटरिंग से लेकर दर्शन व्यवस्था तक कई स्तरों पर पारदर्शिता की कमी बनी हुई है। विशेष रूप से यह मुद्दा उठाया जा रहा है कि वीआईपी दर्शन के नाम पर अब भी कुछ चुनिंदा लोगों को गर्भगृह तक पहुंच दी जा रही है, जबकि आम श्रद्धालु लंबी कतारों में घंटों इंतजार करने को मजबूर हैं। इससे श्रद्धालुओं में असंतोष बढ़ रहा है और व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

धार्मिक परंपराओं और नियमों के अनुसार गर्भगृह में केवल अधिकृत व्यक्तियों—एक बारीदार और एक पुजारी—की ही उपस्थिति अनुमत होती है। इसके बावजूद इस नियम के उल्लंघन के आरोप सामने आना चिंता का विषय है। इसके अलावा मंदिर से ज्योति को घर ले जाने की परंपरा और उसकी मौजूदा व्यवस्था को लेकर भी कई लोग सवाल उठा रहे हैं, जिसे लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देशों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

मंदिर में होने वाले चढ़ावे की व्यवस्था भी चर्चा के केंद्र में है। विशेषकर शयन आरती के समय प्रतिदिन बड़ी मात्रा में चढ़ावा एकत्र होता है, लेकिन आरोप है कि रात के समय इसकी निगरानी के लिए कोई जिम्मेदार सरकारी अधिकारी मौजूद नहीं रहता। इतना ही नहीं, चढ़ावे की गिनती आज भी आधुनिक बैंकिंग मशीनों के बजाय मैन्युअल तरीके से की जा रही है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर संदेह उत्पन्न होता है। यह भी कहा जा रहा है कि इस प्रक्रिया में बार-बार कुछ चुनिंदा लोगों को ही शामिल किया जाता है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या मंदिर में चल रहे सुधारात्मक प्रयास वास्तव में व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और भक्तों के लिए सहज बना पाएंगे, या फिर इन बदलावों के बीच नए विवाद और असंतोष की स्थिति और गहराएगी। फिलहाल, ज्वालामुखी मंदिर की व्यवस्थाओं को लेकर चल रही यह बहस प्रशासन और श्रद्धालुओं दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी है।

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